नई दिल्ली। भारत में पिछले दस वर्षों में करीब ९०,००० सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। मध्य प्रदेश में लगभग ३०,००० और उत्तर प्रदेश में करीब २५,००० स्कूलों का अस्तित्व खत्म हो गया। जबकि सरकार “पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया” का नारा दे रही है, हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
हाल ही में जारी नीति आयोग की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। देशभर में ९८,५९२ सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए काम करने वाले शौचालय नहीं हैं, जबकि ६१,५४० स्कूलों में शौचालय पूरी तरह अनुपयोगी हैं। करीब १,१९,००० स्कूलों में बिजली नहीं है और ५९,८२९ स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा तक नहीं है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि देश में १,०४,१२५ से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक पर चल रहे हैं, जहां एक ही शिक्षक अटेंडेंस लगाता है, पढ़ाता है और सारा काम संभालता है।
अब देश के लोग इस मुद्दे को तीखे अंदाज में उठाते हुए कहते हैं, “सरकार कहती है पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया। लेकिन बच्चा पढ़ेगा कहाँ?” वे पूछते हैं कि इस प्रचंड गर्मी में बिना पंखे के टाट पर बैठकर बच्चे पढ़ रहे हैं, जबकि नेता एसी हॉल में भाषण दे रहे हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन नेताओं के बच्चे हार्वर्ड, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, जॉर्जटाउन और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उसी देश के गरीब बच्चों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं।

अखिलेश यादव की बेटी, निर्मला सीतारमण की बेटी, एस जयशंकर के बेटे और कई अन्य प्रमुख नेताओं के बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।
“नेताओं के बच्चों को अगर पांच साल सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाए तो क्या होगा?
बिना टॉयलेट, बिना बिजली, बिना शिक्षक के स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ेंगे तो शायद हालात बदल जाएं।”
वे कहते हैं कि सरकार के पास टीवी पर विज्ञापन और स्कीमों के लिए बेतहाशा पैसा है, माफ करने के लिए पैसा है, लेकिन स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं देने के लिए पैसा नहीं है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों की बदहाली न सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है बल्कि देश के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। जब गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चे बेहतर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं तो सामाजिक असमानता बढ़ती है।
सरकार को चाहिए कि स्कूलों में बिजली, शौचालय, पंखे, शिक्षकों की भर्ती और बुनियादी ढांचे पर तुरंत ध्यान दे। केवल नारों और योजनाओं से काम नहीं चलेगा। शिक्षा में निवेश ही असली “विकसित भारत” का आधार हो सकता है।
**अंत में सवाल उठता है —** क्या नेता अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने की हिम्मत दिखाएंगे या सिर्फ भाषणबाजी जारी रहेगी?
































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