मध्य प्रदेश में हर साल 60 हजार से ज्यादा पंजीकृत मजदूर 60 साल से पहले दम तोड़ रहे हैं। 2025 में 69 हजार मौतें, 1140 करोड़ मुआवजा। श्रम विभाग ने कलेक्टरों को 5 सूत्रीय निर्देश दिए। संबल योजना की रिपोर्ट और इंदौर सीवर हादसे की पूरी डिटेल पढ़ें।
भोपाल: मध्य प्रदेश में मजदूरों की असमय और ‘खामोश’ मौतें अब सरकार के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई हैं। श्रम विभाग की ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली है – प्रदेश में हर साल औसतन 60 हजार से ज्यादा पंजीकृत श्रमिक अपनी कामकाजी उम्र (18 से 60 साल) में ही दम तोड़ रहे हैं। जबकि राज्य में मनुष्य की औसत आयु करीब 67 वर्ष है। ये मौतें निर्माण स्थलों, फैक्ट्रियों, खेतों और सफाई जैसे खतरनाक कामों से जुड़ी हैं।
सबसे हैरान करने वाला आंकड़ा 2025 का है। संबल योजना (मुख्यमंत्री जन कल्याण संबल योजना) के तहत पंजीकृत मजदूरों में कुल 69 हजार मौतें दर्ज हुईं। इनमें से 57 हजार सामान्य (नेचुरल) मौतें 60 साल से कम उम्र के मजदूरों की थीं। 2023 में यह आंकड़ा 48 हजार और 2024 में 50 हजार था। सरकार को इन मौतों पर अनुग्रह सहायता के रूप में 1,140 करोड़ रुपये मुआवजा देना पड़ा।

इंदौर का सीवर हादसा – स्वच्छता के दावों पर सवाल
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में मार्च के पहले सप्ताह में दो सफाईकर्मी करण और अजय सीवर में जहरीली गैस से दम घुटने से मर गए। चोइथराम मंडी गेट के पास सक्शन टैंकर से काम करते समय पाइप टूट गया। दोनों बिना सुरक्षा उपकरण (गैस डिटेक्टर, ऑक्सीजन मास्क या हार्नेस) के चैंबर में उतरे। घटना के बाद दो घंटे तक न पुलिस, न एंबुलेंस और न रेस्क्यू टीम पहुंची। यह घटना पूरे प्रदेश की मजदूर दुर्दशा का एक छोटा सा उदाहरण है।
कलेक्टरों को मिली बड़ी जिम्मेदारी – 5 सूत्रीय कड़े निर्देश
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए श्रम विभाग के सचिव रघुराज माधव राजेंद्र ने 2 फरवरी को सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिखा है। पत्र में स्पष्ट कहा गया है – “सभी कलेक्टर सुनिश्चित करें कि 60 साल से कम उम्र का कोई भी मजदूर सामान्य मौत न मरे।”
श्रम विभाग ने निवारक स्वास्थ्य उपायों और जागरूकता के लिए 5 सूत्रीय निर्देश जारी किए हैं। मुख्य बिंदु:
जिले में 60 वर्ष से कम उम्र के मजदूरों की मौतों की समीक्षा और रिपोर्टिंग।
स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता अभियान और चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार।
अनुग्रह सहायता योजना के मामलों को अनिवार्य रूप से ग्राम सभा और वार्ड सभा की कार्यसूची में शामिल करना (पारदर्शिता के लिए)।
पौष्टिक भोजन, प्रदूषण नियंत्रण और नियमित स्वास्थ्य जांच पर जोर।
दुर्घटना रोकथाम और सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्यता सुनिश्चित करना।
सरकार का मानना है कि ये कदम न सिर्फ मजदूरों की जान बचाएंगे बल्कि संबल योजना पर बोझ भी कम करेंगे।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
मजदूरों की ये मौतें कुपोषण, शराब, प्रदूषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का नतीजा हैं। कई परिवारों का एकमात्र सहारा चला जाता है। विपक्ष इसे “कुशासन” बता रहा है, जबकि सरकार इसे रोकने के लिए कलेक्टरों को जिम्मेदार ठहरा रही है।
निष्कर्ष: मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था मजदूरों पर टिकी है। अगर कलेक्टर इन निर्देशों को सख्ती से लागू करें तो हजारों परिवार बच सकते हैं। सरकार को अब सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि मजदूरों की सेहत पर भी ध्यान देना होगा.
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